अकीर्तिर्निन्द्यते दैवैः कीर्तिर्देवेषु पूज्यते ।
कीर्त्यर्थं च समारम्भः सर्व एव महात्मनाम् ॥
अकीर्तिर्निन्द्यते दैवैः कीर्तिर्देवेषु पूज्यते ।
कीर्त्यर्थं च समारम्भः सर्व एव महात्मनाम् ॥
M N Dutt
Even the celestials speak ill of bad name whereas fame is adored in all the regions. Therefore the high-souled exert their best to acquire reputations.पदच्छेदः
| अकीर्तिर् | अकीर्ति (१.१) |
| निन्द्यते | निन्द्यते (√निन्द् प्र.पु. एक.) |
| दैवैः | दैव (३.३) |
| कीर्तिर् | कीर्ति (१.१) |
| देवेषु | देव (७.३) |
| पूज्यते | पूज्यते (√पूजय् प्र.पु. एक.) |
| कीर्त्यर्थं | कीर्ति–अर्थ (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| समारम्भः | समारम्भ (१.१) |
| सर्व | सर्व (१.१) |
| एव | एव (अव्ययः) |
| महात्मनाम् | महात्मन् (६.३) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | की | र्ति | र्नि | न्द्य | ते | दै | वैः |
| की | र्ति | र्दे | वे | षु | पू | ज्य | ते |
| की | र्त्य | र्थं | च | स | मा | र | म्भः |
| स | र्व | ए | व | म | हा | त्म | नाम् |