७.४५.१६

लक्ष्मणोऽर्थं तु तं श्रुत्वा शिरसा वन्द्य मैथिलीम् ।
शिवमित्यब्रवीद्धृष्टो हृदयेन विशुष्यता ॥

पदच्छेदः

लक्ष्मणोलक्ष्मण (१.१)
ऽर्थंअर्थ (२.१)
तुतु (अव्ययः)
तंतद् (२.१)
श्रुत्वाश्रुत्वा (√श्रु + क्त्वा)
शिरसाशिरस् (३.१)
वन्द्यवन्द्य (√वन्द् + क्त्वा)
मैथिलीम्मैथिली (२.१)
शिवम्शिव (१.१)
इत्यब्रवीद्इति (अव्ययः)–अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.)
धृष्टोधृष्ट (√धृष् + क्त, १.१)
हृदयेनहृदय (३.१)
विशुष्यताविशुष्यत् (√वि-शुष् + शतृ, ३.१)

छन्दः

अनुष्टुप् [८]

छन्दोविश्लेषणम्

क्ष्म णो ऽर्थंतु तं श्रु त्वा
शि सान्द्य मैथि लीम्
शि मि त्यब्र वी द्धृ ष्टो
हृ येवि शुष्य ता