लक्ष्मणोऽर्थं तु तं श्रुत्वा शिरसा वन्द्य मैथिलीम् ।
शिवमित्यब्रवीद्धृष्टो हृदयेन विशुष्यता ॥
लक्ष्मणोऽर्थं तु तं श्रुत्वा शिरसा वन्द्य मैथिलीम् ।
शिवमित्यब्रवीद्धृष्टो हृदयेन विशुष्यता ॥
पदच्छेदः
| लक्ष्मणो | लक्ष्मण (१.१) |
| ऽर्थं | अर्थ (२.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| तं | तद् (२.१) |
| श्रुत्वा | श्रुत्वा (√श्रु + क्त्वा) |
| शिरसा | शिरस् (३.१) |
| वन्द्य | वन्द्य (√वन्द् + क्त्वा) |
| मैथिलीम् | मैथिली (२.१) |
| शिवम् | शिव (१.१) |
| इत्यब्रवीद् | इति (अव्ययः)–अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
| धृष्टो | धृष्ट (√धृष् + क्त, १.१) |
| हृदयेन | हृदय (३.१) |
| विशुष्यता | विशुष्यत् (√वि-शुष् + शतृ, ३.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ल | क्ष्म | णो | ऽर्थं | तु | तं | श्रु | त्वा |
| शि | र | सा | व | न्द्य | मै | थि | लीम् |
| शि | व | मि | त्य | ब्र | वी | द्धृ | ष्टो |
| हृ | द | ये | न | वि | शु | ष्य | ता |