M N Dutt
Having entered there he saw his elder brother Rāma seated poorly on an excellent seat with his eyes full of tears. Being greatly pained at the sight, Saumitri touched his feet and with folded palms said.
पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा) |
| राघवं | राघव (२.१) |
| दीनम् | दीन (२.१) |
| आसीनं | आसीन (√आस् + क्त, २.१) |
| परमासने | परम–आसन (७.१) |
| नेत्राभ्याम् | नेत्र (३.२) |
| अश्रुपूर्णाभ्यां | अश्रु–पूर्ण (√पृ + क्त, ३.२) |
| ददर्शाग्रजम् | ददर्श (√दृश् लिट् प्र.पु. एक.)–अग्रज (२.१) |
| अग्रतः | अग्रतस् (अव्ययः) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| स | दृ | ष्ट्वा | रा | घ | वं | दी | न |
| मा | सी | नं | प | र | मा | स | ने |
| ने | त्रा | भ्या | म | श्रु | पू | र्णा | भ्यां |
| द | द | र्शा | ग्र | ज | म | ग्र | तः |