M N Dutt
And seeing the saints seated there, that captor of hostile capitals Rāghava, restraining himself, with joined hands, observed.
पदच्छेदः
| उपविष्टान् | उपविष्ट (√उप-विश् + क्त, २.३) |
| ऋषींस्तत्र | ऋषि (२.३)–तत्र (अव्ययः) |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा) |
| परपुरंजयः | परपुरंजय (१.१) |
| प्रयतः | प्रयत (√प्र-यम् + क्त, १.१) |
| प्राञ्जलिर् | प्राञ्जलि (१.१) |
| भूत्वा | भूत्वा (√भू + क्त्वा) |
| राघवो | राघव (१.१) |
| वाक्यम् | वाक्य (२.१) |
| अब्रवीत् | अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| उ | प | वि | ष्टा | नृ | षीं | स्त | त्र |
| दृ | ष्ट्वा | प | र | पु | रं | ज | यः |
| प्र | य | तः | प्रा | ञ्ज | लि | र्भू | त्वा |
| रा | घ | वो | वा | क्य | म | ब्र | वीत् |