त्वया पुनर्ब्राह्मणगौरवादियं; कृता प्रतिज्ञा ह्यनवेक्ष्य कारणम् ।
कुरुष्व कर्ता ह्यसि नात्र संशयो; महाभयात्त्रातुमृषींस्त्वमर्हसि ॥
त्वया पुनर्ब्राह्मणगौरवादियं; कृता प्रतिज्ञा ह्यनवेक्ष्य कारणम् ।
कुरुष्व कर्ता ह्यसि नात्र संशयो; महाभयात्त्रातुमृषींस्त्वमर्हसि ॥
M N Dutt
But, without knowing the task, you have bound yourself by a promise for the glory of the Brahmanas. And you, without doubt, will succeed in effecting the work; and it behove you to deliver the sages from a mighty fright.पदच्छेदः
| त्वया | त्वद् (३.१) |
| पुनर् | पुनर् (अव्ययः) |
| ब्राह्मणगौरवाद् | ब्राह्मण–गौरव (५.१) |
| इयं | इदम् (१.१) |
| कृत्वा | कृत्वा (√कृ + क्त्वा) |
| प्रतिज्ञा | प्रतिज्ञा (१.१) |
| ह्यनवेक्ष्य | हि (अव्ययः)–अनवेक्ष्य (अव्ययः) |
| कारणम् | कारण (२.१) |
| कुरुष्व | कुरुष्व (√कृ लोट् म.पु. ) |
| कर्ता | कर्तृ (१.१) |
| ह्यसि | हि (अव्ययः)–असि (√अस् लट् म.पु. ) |
| नात्र | न (अव्ययः)–अत्र (अव्ययः) |
| संशयो | संशय (१.१) |
| महाभयात् | महत्–भय (५.१) |
| त्रातुम् | त्रातुम् (√त्रा + तुमुन्) |
| ऋषींस्त्वम् | ऋषि (२.३)–त्वद् (१.१) |
| अर्हसि | अर्हसि (√अर्ह् लट् म.पु. ) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | या | पु | न | र्ब्रा | ह्म | ण | गौ | र | वा | दि | यं |
| कृ | ता | प्र | ति | ज्ञा | ह्य | न | वे | क्ष्य | का | र | णम् |
| कु | रु | ष्व | क | र्ता | ह्य | सि | ना | त्र | सं | श | यो |
| म | हा | भ | या | त्त्रा | तु | मृ | षीं | स्त्व | म | र्ह | सि |
| ज | त | ज | र | ||||||||