तच्छ्रुत्वा विप्रियं घोरं सहस्राक्षेण भाषितम् ।
व्रीडितोऽवाङ्मुखो राजा व्याहर्तुं न शशाक ह ॥
तच्छ्रुत्वा विप्रियं घोरं सहस्राक्षेण भाषितम् ।
व्रीडितोऽवाङ्मुखो राजा व्याहर्तुं न शशाक ह ॥
M N Dutt
Hearing those dreadful and unpleasant words from Indra, the king lowered his head in shame and became silent.पदच्छेदः
| तच्छ्रुत्वा | तद् (२.१)–श्रुत्वा (√श्रु + क्त्वा) |
| विप्रियं | विप्रिय (२.१) |
| घोरं | घोर (२.१) |
| सहस्राक्षेण | सहस्राक्ष (३.१) |
| भाषितम् | भाषित (√भाष् + क्त, २.१) |
| व्रीडितो | व्रीडित (√व्रीड् + क्त, १.१) |
| ऽवाङ्मुखो | अवाङ्मुख (१.१) |
| राजा | राजन् (१.१) |
| व्याहर्तुं | व्याहर्तुम् (√व्या-हृ + तुमुन्) |
| न | न (अव्ययः) |
| शशाक | शशाक (√शक् लिट् प्र.पु. एक.) |
| ह | ह (अव्ययः) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | च्छ्रु | त्वा | वि | प्रि | यं | घो | रं |
| स | ह | स्रा | क्षे | ण | भा | षि | तम् |
| व्री | डि | तो | ऽवा | ङ्मु | खो | रा | जा |
| व्या | ह | र्तुं | न | श | शा | क | ह |