M N Dutt
We have been overpowered by the Rākṣasas. And, o lord of creatures, from fear of those wicked-minded ones, we cannot remain in our own homes.
पदच्छेदः
| राक्षसैर् | राक्षस (३.३) |
| अभिभूताः | अभिभूत (√अभि-भू + क्त, १.३) |
| स्म | स्म (अव्ययः) |
| न | न (अव्ययः) |
| शक्ताः | शक्त (√शक् + क्त, १.३) |
| स्म | स्मः (√अस् लट् उ.पु. द्वि.) |
| उमापते | उमापति (८.१) |
| स्वेषु | स्व (७.३) |
| वेश्मसु | वेश्मन् (७.३) |
| संस्थातुं | संस्थातुम् (√सम्-स्था + तुमुन्) |
| भयात् | भय (५.१) |
| तेषां | तद् (६.३) |
| दुरात्मनाम् | दुरात्मन् (६.३) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| रा | क्ष | सै | र | भि | भू | ताः | स्म |
| न | श | क्ताः | स्म | उ | मा | प | ते |
| स्वे | षु | वे | श्म | सु | सं | स्था | तुं |
| भ | या | त्ते | षां | दु | रा | त्म | नाम् |