M N Dutt
There upon considering Śatrughna slain the night-ranger did not enter his house albeit he got the opportunity; and moreover beholding him fallen and destroyed he did not take up his dart. He then began to carry his collected food.
पदच्छेदः
| नापि | न (अव्ययः)–अपि (अव्ययः) |
| शूलं | शूल (२.१) |
| प्रजग्राह | प्रजग्राह (√प्र-ग्रह् लिट् प्र.पु. एक.) |
| तं | तद् (२.१) |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा) |
| भुवि | भू (७.१) |
| पातितम् | पातित (√पातय् + क्त, २.१) |
| ततो | ततस् (अव्ययः) |
| हत | हत (√हन् + क्त, १.१) |
| इति | इति (अव्ययः) |
| ज्ञात्वा | ज्ञात्वा (√ज्ञा + क्त्वा) |
| तान् | तद् (२.३) |
| भक्षान् | भक्ष (२.३) |
| समुदावहत् | समुदावहत् (√समुदा-वह् लङ् प्र.पु. एक.) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| ना | पि | शू | लं | प्र | ज | ग्रा | ह |
| तं | दृ | ष्ट्वा | भु | वि | पा | ति | तम् |
| त | तो | ह | त | इ | ति | ज्ञा | त्वा |
| ता | न्भ | क्षा | न्स | मु | दा | व | हत् |