तैरश्वैर्भ्राम्यते भ्रान्तैः सुमाली राक्षसेश्वरः ।
इन्द्रियाश्वैर्यथा भ्रान्तैर्धृतिहीनो यथा नरः ॥
तैरश्वैर्भ्राम्यते भ्रान्तैः सुमाली राक्षसेश्वरः ।
इन्द्रियाश्वैर्यथा भ्रान्तैर्धृतिहीनो यथा नरः ॥
M N Dutt
And with his bewildered steeds Sumali wanders like a person deprived of patience, whose senses are under hallucination.पदच्छेदः
| तैर् | तद् (३.३) |
| अश्वैर् | अश्व (३.३) |
| भ्राम्यते | भ्राम्यते (√भ्रामय् प्र.पु. एक.) |
| भ्रान्तैः | भ्रान्त (√भ्रम् + क्त, ३.३) |
| सुमाली | सुमालिन् (१.१) |
| राक्षसेश्वरः | राक्षस–ईश्वर (१.१) |
| इन्द्रियाश्वैर् | इन्द्रिय–अश्व (३.३) |
| यथा | यथा (अव्ययः) |
| भ्रान्तैर् | भ्रान्त (√भ्रम् + क्त, ३.३) |
| धृतिहीनो | धृति–हीन (√हा + क्त, १.१) |
| यथा | यथा (अव्ययः) |
| नरः | नर (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तै | र | श्वै | र्भ्रा | म्य | ते | भ्रा | न्तैः |
| सु | मा | ली | रा | क्ष | से | श्व | रः |
| इ | न्द्रि | या | श्वै | र्य | था | भ्रा | न्तै |
| र्धृ | ति | ही | नो | य | था | न | रः |