M N Dutt
He was stricken with hunger and was greatly incensed on beholding his daughter in that wretched plight, as if burning the three worlds with rage. Addressing his pupils, he said.
पदच्छेदः
| तस्य | तद् (६.१) |
| रोषः | रोष (१.१) |
| समभवत् | समभवत् (√सम्-भू लङ् प्र.पु. एक.) |
| क्षुधार्तस्य | क्षुधा–आर्त (६.१) |
| विशेषतः | विशेषतः (अव्ययः) |
| निर्दहन्न् | निर्दहत् (√निः-दह् + शतृ, १.१) |
| इव | इव (अव्ययः) |
| लोकांस्त्रीञ् | लोक (२.३)–त्रि (२.३) |
| शिष्यांश्चेदम् | शिष्य (२.३)–च (अव्ययः)–इदम् (२.१) |
| उवाच | उवाच (√वच् लिट् प्र.पु. एक.) |
| ह | ह (अव्ययः) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| त | स्य | रो | षः | स | म | भ | व |
| त्क्षु | धा | र्त | स्य | वि | शे | ष | तः |
| नि | र्द | ह | न्नि | व | लो | कां | स्त्री |
| ञ्शि | ष्यां | श्चे | द | मु | वा | च | ह |