M N Dutt
Do you witness today the dreadful calamity, arising out of my flaming ire, of the vicious Daņda treading the path of immorality.
पदच्छेदः
| पश्यध्वं | पश्यध्वम् (√पश् लोट् म.पु. द्वि.) |
| विपरीतस्य | विपरीत (६.१) |
| दण्डस्याविदितात्मनः | दण्ड (६.१)–अविदित–आत्मन् (६.१) |
| विपत्तिं | विपत्ति (२.१) |
| घोरसंकाशां | घोर–संकाश (२.१) |
| क्रुद्धाम् | क्रुद्ध (√क्रुध् + क्त, २.१) |
| अग्निशिखाम् | अग्नि–शिखा (२.१) |
| इव | इव (अव्ययः) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| प | श्य | ध्वं | वि | प | री | त | स्य |
| द | ण्ड | स्या | वि | दि | ता | त्म | नः |
| वि | प | त्तिं | घो | र | सं | का | शां |
| क्रु | द्धा | म | ग्नि | शि | खा | मि | व |