M N Dutt
Arriving there they observed that the leading Asura was spreading rays all over, the outcome of his own effulgence, as if devouring the three worlds and burning down the quarters.
पदच्छेदः
| ते | तद् (१.३) |
| ऽपश्यंस्तेजसा | अपश्यन् (√पश् लङ् प्र.पु. बहु.)–तेजस् (३.१) |
| भूतं | भूत (√भू + क्त, २.१) |
| तपन्तम् | तपत् (√तप् + शतृ, २.१) |
| असुरोत्तमम् | असुर–उत्तम (२.१) |
| पिबन्तम् | पिबत् (√पा + शतृ, २.१) |
| इव | इव (अव्ययः) |
| लोकांस्त्रीन्निर्दहन्तम् | लोक (२.३)–त्रि (२.३)–निर्दहत् (√निः-दह् + शतृ, २.१) |
| इवाम्बरम् | इव (अव्ययः)–अम्बर (२.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| ते | ऽप | श्यं | स्ते | ज | सा | भू | तं |
| त | प | न्त | म | सु | रो | त्त | मम् |
| पि | ब | न्त | मि | व | लो | कां | स्त्री |
| न्नि | र्द | ह | न्त | मि | वा | म्ब | रम् |