पदच्छेदः
| ते | तद् (१.३) |
| ताम् | तद् (२.१) |
| ऊचुस्ततो | ऊचुः (√वच् लिट् प्र.पु. बहु.)–ततस् (अव्ययः) |
| देवास्तुष्टाः | देव (१.३)–तुष्ट (√तुष् + क्त, १.३) |
| प्रीतिसमन्विताः | प्रीति–समन्वित (१.३) |
| चतुर्धा | चतुर्धा (अव्ययः) |
| विभजात्मानम् | विभज (√वि-भज् लोट् म.पु. )–आत्मन् (२.१) |
| आत्मनैव | आत्मन् (३.१)–एव (अव्ययः) |
| दुरासदे | दुरासद (८.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ते | ता | मू | चु | स्त | तो | दे | वा |
| स्तु | ष्टाः | प्री | ति | स | म | न्वि | ताः |
| च | तु | र्धा | वि | भ | जा | त्मा | न |
| मा | त्म | नै | व | दु | रा | स | दे |