हन्तारो ब्राह्मणान्ये तु प्रेक्षापूर्वमदूषकान् ।
तांश्चतुर्थेन भागेन संश्रयिष्ये सुरर्षभाः ॥
हन्तारो ब्राह्मणान्ये तु प्रेक्षापूर्वमदूषकान् ।
तांश्चतुर्थेन भागेन संश्रयिष्ये सुरर्षभाः ॥
पदच्छेदः
| हन्तारो | हन्तारः (√हन् लुट् प्र.पु. बहु.) |
| ब्राह्मणान् | ब्राह्मण (२.३) |
| ये | यद् (१.३) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| प्रेक्षापूर्वम् | प्रेक्षा–पूर्वम् (अव्ययः) |
| अदूषकान् | अदूषक (२.३) |
| तांश्चतुर्थेन | तद् (२.३)–चतुर्थ (३.१) |
| भागेन | भाग (३.१) |
| संश्रयिष्ये | संश्रयिष्ये (√सम्-श्रि लृट् उ.पु. ) |
| सुरर्षभाः | सुर–ऋषभ (८.३) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह | न्ता | रो | ब्रा | ह्म | णा | न्ये | तु |
| प्रे | क्षा | पू | र्व | म | दू | ष | कान् |
| तां | श्च | तु | र्थे | न | भा | गे | न |
| सं | श्र | यि | ष्ये | सु | र | र्ष | भाः |