M N Dutt
Being at his wit's end he repaired to the other side of the Lokāloka mountain and remained there for some time like a coiled serpent.
पदच्छेदः
| सो | तद् (१.१) |
| ऽन्तम् | अन्त (२.१) |
| आश्रित्य | आश्रित्य (√आ-श्रि + ल्यप्) |
| लोकानां | लोक (६.३) |
| नष्टसंज्ञो | नष्ट (√नश् + क्त)–संज्ञा (१.१) |
| विचेतनः | विचेतन (१.१) |
| कालं | काल (२.१) |
| तत्रावसत् | तत्र (अव्ययः)–अवसत् (√वस् लङ् प्र.पु. एक.) |
| कंचिद् | कश्चित् (२.१) |
| वेष्टमानो | वेष्टमान (√वेष्ट् + शानच्, १.१) |
| यथोरगः | यथा (अव्ययः)–उरग (१.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| सो | ऽन्त | मा | श्रि | त्य | लो | का | नां |
| न | ष्ट | सं | ज्ञो | वि | चे | त | नः |
| का | लं | त | त्रा | व | स | त्कं | चि |
| द्वे | ष्ट | मा | नो | य | थो | र | गः |