त्यक्ष्याम्यहं स्वकं राज्यं नाहं भृत्यैर्विना कृतः ।
वर्तयेयं क्षणं ब्रह्मन्समनुज्ञातुमर्हसि ॥
त्यक्ष्याम्यहं स्वकं राज्यं नाहं भृत्यैर्विना कृतः ।
वर्तयेयं क्षणं ब्रह्मन्समनुज्ञातुमर्हसि ॥
M N Dutt
O Brāhmaṇa, I shall renounce my own kingdom. Separated from my servants, I shall not be able to live even for a moment. Do you give me permission in this.पदच्छेदः
| त्यक्ष्याम्यहं | त्यक्ष्यामि (√त्यज् लृट् उ.पु. )–मद् (१.१) |
| स्वकं | स्वक (२.१) |
| राज्यं | राज्य (२.१) |
| नाहं | न (अव्ययः)–मद् (१.१) |
| भृत्यैर् | भृत्य (३.३) |
| विनाकृतः | विनाकृत (१.१) |
| वर्तयेयं | वर्तयेयम् (√वर्तय् विधिलिङ् उ.पु. ) |
| क्षणं | क्षण (२.१) |
| ब्रह्मन् | ब्रह्मन् (८.१) |
| समनुज्ञातुम् | समनुज्ञातुम् (√समनु-ज्ञा + तुमुन्) |
| अर्हसि | अर्हसि (√अर्ह् लट् म.पु. ) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्य | क्ष्या | म्य | हं | स्व | कं | रा | ज्यं |
| ना | हं | भृ | त्यै | र्वि | ना | कृ | तः |
| व | र्त | ये | यं | क्ष | णं | ब्र | ह्म |
| न्स | म | नु | ज्ञा | तु | म | र्ह | सि |