सोऽब्रवीद्राघवः प्रीतः प्राञ्जलिप्रग्रहो द्विजम् ।
इमौ कुमारौ तं देशं ब्रह्मर्षे विजयिष्यतः ॥
सोऽब्रवीद्राघवः प्रीतः प्राञ्जलिप्रग्रहो द्विजम् ।
इमौ कुमारौ तं देशं ब्रह्मर्षे विजयिष्यतः ॥
पदच्छेदः
| सो | तद् (१.१) |
| ऽब्रवीद् | अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
| राघवः | राघव (१.१) |
| प्रीतः | प्रीत (√प्री + क्त, १.१) |
| प्राञ्जलिप्रग्रहो | प्राञ्जलि–प्रग्रह (१.१) |
| द्विजम् | द्विज (२.१) |
| इमौ | इदम् (१.२) |
| कुमारौ | कुमार (१.२) |
| तं | तद् (२.१) |
| देशं | देश (२.१) |
| ब्रह्मर्षे | ब्रह्मर्षि (८.१) |
| विजयिष्यतः | विजयिष्यतः (√वि-जि लृट् प्र.पु. द्वि.) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सो | ऽब्र | वी | द्रा | घ | वः | प्री | तः |
| प्रा | ञ्ज | लि | प्र | ग्र | हो | द्वि | जम् |
| इ | मौ | कु | मा | रौ | तं | दे | शं |
| ब्र | ह्म | र्षे | वि | ज | यि | ष्य | तः |