पदच्छेदः
| भरतं | भरत (२.१) |
| चाग्रतः | च (अव्ययः)–अग्रतस् (अव्ययः) |
| कृत्वा | कृत्वा (√कृ + क्त्वा) |
| कुमारौ | कुमार (१.२) |
| सबलानुगौ | स (अव्ययः)–बल–अनुग (१.२) |
| निहत्य | निहत्य (√नि-हन् + ल्यप्) |
| गन्धर्वसुतान् | गन्धर्व–सुत (२.३) |
| द्वे | द्वि (२.२) |
| पुरे | पुर (२.२) |
| विभजिष्यतः | विभजिष्यतः (√वि-भज् लृट् प्र.पु. द्वि.) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भ | र | तं | चा | ग्र | तः | कृ | त्वा |
| कु | मा | रौ | स | ब | ला | नु | गौ |
| नि | ह | त्य | ग | न्ध | र्व | सु | ता |
| न्द्वे | पु | रे | वि | भ | जि | ष्य | तः |