M N Dutt
And there he saw the great Rāma, clothed in silk raiment burning like fire in the midst of the ascetics. There upon remembering his duty he saluted Rāma, conversant with piety and with folded hands said.
पदच्छेदः
| सो | तद् (१.१) |
| ऽभिवाद्य | अभिवाद्य (√अभि-वादय् + ल्यप्) |
| ततो | तत (√तन् + क्त, १.१) |
| रामं | राम (२.१) |
| प्राञ्जलिः | प्राञ्जलि (१.१) |
| प्रयतेन्द्रियः | प्रयत (√प्र-यम् + क्त)–इन्द्रिय (१.१) |
| उवाच | उवाच (√वच् लिट् प्र.पु. एक.) |
| वाक्यं | वाक्य (२.१) |
| धर्मज्ञो | धर्म–ज्ञ (१.१) |
| धर्मम् | धर्म (२.१) |
| एवानुचिन्तयन् | एव (अव्ययः)–अनुचिन्तयत् (√अनु-चिन्तय् + शतृ, १.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| सो | ऽभि | वा | द्य | त | तो | रा | मं |
| प्रा | ञ्ज | लिः | प्र | य | ते | न्द्रि | यः |
| उ | वा | च | वा | क्यं | ध | र्म | ज्ञो |
| ध | र्म | मे | वा | नु | चि | न्त | यन् |