समृद्धार्थो नरश्रेष्ठ स्वराज्यं प्रशशास ह ।
प्रमुमोद च लोकस्तं नृपमासाद्य राघव ।
नष्टशोकः समृद्धार्थो बभूव विगतज्वरः ॥
समृद्धार्थो नरश्रेष्ठ स्वराज्यं प्रशशास ह ।
प्रमुमोद च लोकस्तं नृपमासाद्य राघव ।
नष्टशोकः समृद्धार्थो बभूव विगतज्वरः ॥
अन्वयः
राघव O Rama, तम् him, नृपम् as king, आसाद्य having obtained, लोक: the world, प्रमुमोद rejoiced, समृद्धार्थ: having achieved his desire, विगतज्वर: freed from mental afflictions, नष्टशोक: with his sorrows mitigated, बभूव became.Summary
"O Best of the Raghus the world rejoiced having Bhagiratha as king. With his purpose achieved, he was freed from all mental afflictions and sorrows and thereafter lived happily.पदच्छेदः
| समृद्धार्थो | समृद्ध (√सम्-ऋध् + क्त)–अर्थ (१.१) |
| नरश्रेष्ठ | नर–श्रेष्ठ (८.१) |
| स्वराज्यं | स्व–राज्य (२.१) |
| प्रशशास | प्रशशास (√प्र-शास् लिट् प्र.पु. एक.) |
| ह | ह (अव्ययः) |
| प्रमुमोद | प्रमुमोद (√प्र-मुद् लिट् प्र.पु. एक.) |
| च | च (अव्ययः) |
| लोकस् | लोक (१.१) |
| तं | तद् (२.१) |
| नृपम् | नृप (२.१) |
| आसाद्य | आसाद्य (√आ-सादय् + ल्यप्) |
| राघव | राघव (८.१) |
| नष्टशोकः | नष्ट (√नश् + क्त)–शोक (१.१) |
| समृद्धार्थो | समृद्ध (√सम्-ऋध् + क्त)–अर्थ (१.१) |
| बभूव | बभूव (√भू लिट् प्र.पु. एक.) |
| विगतज्वरः | विगत (√वि-गम् + क्त)–ज्वर (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | मृ | द्धा | र्थो | न | र | श्रे | ष्ठ | स्व | रा | ज्यं | प्र |
| श | शा | स | ह | प्र | मु | मो | द | च | लो | क | स्तं |
| नृ | प | मा | सा | द्य | रा | घ | व | न | ष्ट | शो | कः |
| स | मृ | द्धा | र्थो | ब | भू | व | वि | ग | त | ज्व | रः |