गता भगवती रात्रिः श्रोतव्यं परमं श्रुतम् ।
क्षणभूतेव सा रात्रिः संवृत्तेयं महातपः ।
इमां चिन्तयतः सर्वां निखिलेन कथां तव ॥
गता भगवती रात्रिः श्रोतव्यं परमं श्रुतम् ।
क्षणभूतेव सा रात्रिः संवृत्तेयं महातपः ।
इमां चिन्तयतः सर्वां निखिलेन कथां तव ॥
अन्वयः
महातप: O Great performer of austerities, परमम् supreme, श्रोतव्यम् fit to be listened, श्रुतम् has been heard, भगवती glorious, रात्रि: night, गता has passed, तव your, इमाम् this, सर्वाम् complete, कथाम् story, चिन्तयत: pondering over, नौ for both of us, इयम् this, रात्रि: night, क्षणभूतेव like a moment, सम्वृत्ता has turned out to be.M N Dutt
And, O afflicter of foes, as we had been reflecting upon all this at length, the night has passed away as if it were as moment.Summary
"O Noble ascetic we have heard this great story worthy to be listened. As we both lay pondering over the entire story (narrated by you), the glorious night passed off just like a moment.पदच्छेदः
| गता | गत (√गम् + क्त, १.१) |
| भगवती | भगवत् (१.१) |
| रात्रिः | रात्रि (१.१) |
| श्रोतव्यं | श्रोतव्य (√श्रु + कृत्, १.१) |
| परमं | परम (१.१) |
| श्रुतम् | श्रुत (√श्रु + क्त, १.१) |
| क्षणभूतेव | क्षण–भूत (√भू + क्त, १.१)–इव (अव्ययः) |
| सा | तद् (१.१) |
| रात्रिः | रात्रि (१.१) |
| संवृत्तेयं | संवृत्त (√सम्-वृत् + क्त, १.१)–इदम् (१.१) |
| महातपः | महत्–तपस् (८.१) |
| इमां | इदम् (२.१) |
| चिन्तयतः | चिन्तयत् (√चिन्तय् + शतृ, ६.१) |
| सर्वां | सर्व (२.१) |
| निखिलेन | निखिल (३.१) |
| कथां | कथा (२.१) |
| तव | त्वद् (६.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | ता | भ | ग | व | ती | रा | त्रिः | श्रो | त | व्यं | प |
| र | मं | श्रु | तम् | क्ष | ण | भू | ते | व | सा | रा | त्रिः |
| सं | वृ | त्ते | यं | म | हा | त | पः | इ | मां | चि | न्त |
| य | तः | स | र्वां | नि | खि | ले | न | क | थां | त | व |