गतः स नृपतिस्तत्र गन्तव्यं यत्र तेन वै ।
प्रवृत्तिरेषा मर्त्यानां त्वं तु मिथ्या विहन्यसे ॥
गतः स नृपतिस्तत्र गन्तव्यं यत्र तेन वै ।
प्रवृत्तिरेषा मर्त्यानां त्वं तु मिथ्या विहन्यसे ॥
अन्वयः
सः that, नृपतिः king, तेन by him, यत्र wherever, गन्तव्यम् ought to go, तत्र there, गतः had gone, मर्त्यानाम् mortals', प्रवृत्ति: (destiny) nature, एषा such is, त्वं तु as for you, मिथ्या fruitlessly, विहन्यसे (undergoing difficulties).Summary
That king (Dasaratha) has gone to the place where he ought to go. Such is the nature of mortals. You are fruitlessly undergoing difficulties.पदच्छेदः
| गतः | गत (√गम् + क्त, १.१) |
| स | तद् (१.१) |
| नृपतिस् | नृपति (१.१) |
| तत्र | तत्र (अव्ययः) |
| गन्तव्यं | गन्तव्य (√गम् + कृत्, १.१) |
| यत्र | यत्र (अव्ययः) |
| तेन | तद् (३.१) |
| वै | वै (अव्ययः) |
| प्रवृत्तिर् | प्रवृत्ति (१.१) |
| एषा | एतद् (१.१) |
| मर्त्यानां | मर्त्य (६.३) |
| त्वं | त्वद् (१.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| मिथ्या | मिथ्या (अव्ययः) |
| विहन्यसे | विहन्यसे (√वि-हन् म.पु. ) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | तः | स | नृ | प | ति | स्त | त्र |
| ग | न्त | व्यं | य | त्र | ते | न | वै |
| प्र | वृ | त्ति | रे | षा | म | र्त्या | नां |
| त्वं | तु | मि | थ्या | वि | ह | न्य | से |