नराश्च नार्यश्च समेत्य संघशो; विगर्हमाणा भरतस्य मातरम् ।
तदा नगर्यां नरदेवसंक्षये; बभूवुरार्ता न च शर्म लेभिरे ॥
नराश्च नार्यश्च समेत्य संघशो; विगर्हमाणा भरतस्य मातरम् ।
तदा नगर्यां नरदेवसंक्षये; बभूवुरार्ता न च शर्म लेभिरे ॥
अन्वयः
तदा then, नरदेवसङ्क्षये after the demise of the king, नगर्याम् in the city, नराश्च men, नार्यश्च women, सङ्घशः in groups, समेत्य assembled, भरतस्य Bharata's, मातरम् mother, विगर्हमाणाः denounced, आर्ताः बभूवुः became extremely distressed, शर्म peace, न च लेभिरे did not haveM N Dutt
And on on the demise of that illustrious personage, in the city men and women in multitudes, censuring Bharata's mother, became extremely distressed, and did not attain peace of mind.Summary
After the demise of the king, men and women in the city assembled in groups and denounced the mother of Bharata. Extremely distressed, they had no peace of mind. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे षट्षष्टितमस्सर्गः॥Thus ends the sixtysixth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| नराश् | नर (१.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| नार्यश् | नारी (१.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| समेत्य | समेत्य (√समा-इ + ल्यप्) |
| संघशो | संघशस् (अव्ययः) |
| विगर्हमाणा | विगर्हमाण (√वि-गर्ह् + शानच्, १.३) |
| भरतस्य | भरत (६.१) |
| मातरम् | मातृ (२.१) |
| तदा | तदा (अव्ययः) |
| नगर्यां | नगरी (७.१) |
| नरदेवसंक्षये | नरदेव–संक्षय (७.१) |
| बभूवुर् | बभूवुः (√भू लिट् प्र.पु. बहु.) |
| आर्ता | आर्त (१.३) |
| न | न (अव्ययः) |
| च | च (अव्ययः) |
| शर्म | शर्मन् (२.१) |
| लेभिरे | लेभिरे (√लभ् लिट् प्र.पु. बहु.) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | रा | श्च | ना | र्य | श्च | स | मे | त्य | सं | घ | शो |
| वि | ग | र्ह | मा | णा | भ | र | त | स्य | मा | त | रम् |
| त | दा | न | ग | र्यां | न | र | दे | व | सं | क्ष | ये |
| ब | भू | वु | रा | र्ता | न | च | श | र्म | ले | भि | रे |
| ज | त | ज | र | ||||||||