शीलेन साम्ना विनयेन सीतां; नयेन न प्राप्स्यसि चेन्नरेन्द्र ।
ततः समुत्सादय हेमपुङ्खै;र्महेन्द्रवज्रप्रतिमैः शरौघैः ॥
शीलेन साम्ना विनयेन सीतां; नयेन न प्राप्स्यसि चेन्नरेन्द्र ।
ततः समुत्सादय हेमपुङ्खै;र्महेन्द्रवज्रप्रतिमैः शरौघैः ॥
अन्वयः
नरेन्द्र O king, शीलेन with right conduct, साम्ना by appeasing, विनयेन through humility, नयेन by diplomacy, सीताम् Sita, न प्राप्स्यसि यदि if you do not get her, ततः then, हेमपुङ्खैः with gold feathered, महेन्द्रवज्रप्रतिमैः equalling Indra's thunderbolt, शरौघैः by stream of arrows, समुत्सादय destroy.Summary
O king if you fail to get Sita through appeasement, through humility or diplomacy then you destroy (the three worlds) by your goldtipped stream of arrows comparable to Indra's thunderbolt.इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे पञ्चषष्टितमस्सर्गः॥Thus ends the sixtyfifth sarga of Aranyakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| शीलेन | शील (३.१) |
| साम्ना | सामन् (३.१) |
| विनयेन | विनय (३.१) |
| सीतां | सीता (२.१) |
| नयेन | न (अव्ययः)–यद् (३.१) |
| न | न (अव्ययः) |
| प्राप्स्यसि | प्राप्स्यसि (√प्र-आप् लृट् म.पु. ) |
| चेन् | चेद् (अव्ययः) |
| नरेन्द्र | नरेन्द्र (८.१) |
| ततः | ततस् (अव्ययः) |
| समुत्सादय | समुत्सादय (√समुत्-सादय् लोट् म.पु. ) |
| हेमपुङ्खैर् | हेमन्–पुङ्ख (३.३) |
| महेन्द्रवज्रप्रतिमैः | महत्–इन्द्र–वज्र–प्रतिमा (३.३) |
| शरौघैः | शर–ओघ (३.३) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शी | ले | न | सा | म्ना | वि | न | ये | न | सी | तां |
| न | ये | न | न | प्रा | प्स्य | सि | चे | न्न | रे | न्द्र |
| त | तः | स | मु | त्सा | द | य | हे | म | पु | ङ्खै |
| र्म | हे | न्द्र | व | ज्र | प्र | ति | मैः | श | रौ | घैः |