महागजैश्चापि तथा नदद्भिः; सूपूजितैश्चापि तथा सुसद्भिः ।
रराज वीरैश्च विनिःश्वसद्भि;र्ह्रदो भुजङ्गैरिव निःश्वसद्भिः ॥
महागजैश्चापि तथा नदद्भिः; सूपूजितैश्चापि तथा सुसद्भिः ।
रराज वीरैश्च विनिःश्वसद्भि;र्ह्रदो भुजङ्गैरिव निःश्वसद्भिः ॥
अन्वयः
तथा likewise, नदद्भिः trumpeting, महागजैश्चापि huge elephants, तथा likewise, सुपूजितैः revered, सुसद्भिः चापि by the wellkept ones, रराज stood, विनिःश्वसद्भः those breathing heavily, वीरैच: heroes, निःश्वसद्भिः by hissing, भुजङ्गैः by serpents, ह्रदः इव like a lake, रराज stood.M N Dutt
And with gigantic elephants roaring, (the place), honoured by pious persons, with its heroes heaving sighs looked exceedingly beautiful like a lake in which serpents are sighing forth.Summary
There were huge elephants trumpeting, respected people, warriors sighing for the lack of enemies (to vanquish). It had a lake infested with hissing snakes.पदच्छेदः
| महागजैश् | महत्–गज (३.३) |
| चापि | च (अव्ययः)–अपि (अव्ययः) |
| तथा | तथा (अव्ययः) |
| नदद्भिः | नदत् (√नद् + शतृ, ३.३) |
| सुपूजितैश् | सु (अव्ययः)–पूजित (√पूजय् + क्त, ३.३) |
| चापि | च (अव्ययः)–अपि (अव्ययः) |
| तथा | तथा (अव्ययः) |
| सुसद्भिः | सु (अव्ययः)–सत् (√अस् + शतृ, ३.३) |
| रराज | रराज (√राज् लिट् प्र.पु. एक.) |
| वीरैश्च | वीर (३.३)–च (अव्ययः) |
| विनिःश्वसद्भिर् | विनिःश्वसत् (√विनिः-श्वस् + शतृ, ३.३) |
| ह्रदो | ह्रद (१.१) |
| भुजङ्गैर् | भुजंग (३.३) |
| इव | इव (अव्ययः) |
| निःश्वसद्भिः | निःश्वसत् (√निः-श्वस् + शतृ, ३.३) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | हा | ग | जै | श्चा | पि | त | था | न | द | द्भिः |
| सू | पू | जि | तै | श्चा | पि | त | था | सु | स | द्भिः |
| र | रा | ज | वी | रै | श्च | वि | निः | श्व | स | द्भि |
| र्ह्र | दो | भु | ज | ङ्गै | रि | व | निः | श्व | स | द्भिः |