पदच्छेदः
| रावणाद् | रावण (५.१)–रावण (५.१) |
| विनिवृत्तार्था | विनिवृत्त (√विनि-वृत् + क्त)–अर्थ (१.१)–विनिवृत्त (√विनि-वृत् + क्त)–अर्थ (१.१) |
| मर्तव्यकृतनिश्चया | मर्तव्य (√मृ + कृत्)–कृत (√कृ + क्त)–निश्चय (१.१)–मर्तव्य (√मृ + कृत्)–कृत (√कृ + क्त)–निश्चय (१.१) |
| कथंचिन् | कथंचिद् (अव्ययः) |
| मृगशावाक्षी | मृगशावाक्षी (१.१) |
| विश्वासम् | विश्वास (२.१) |
| उपपादिता | उपपादित (√उप-पादय् + क्त, १.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | व | णा | द्वि | नि | वृ | त्ता | र्था |
| म | र्त | व्य | कृ | त | नि | श्च | या |
| क | थं | चि | न्मृ | ग | शा | वा | क्षी |
| वि | श्वा | स | मु | प | पा | दि | ता |