यस्य लाङ्गूलशब्देन स्वनन्तीव दिशो दश ।
एष वानरराजेन सुर्ग्रीवेणाभिषेचितः ।
यौवराज्येऽङ्गदो नाम त्वामाह्वयति संयुगे ॥
यस्य लाङ्गूलशब्देन स्वनन्तीव दिशो दश ।
एष वानरराजेन सुर्ग्रीवेणाभिषेचितः ।
यौवराज्येऽङ्गदो नाम त्वामाह्वयति संयुगे ॥
पदच्छेदः
| यस्य | यद् (६.१) |
| लाङ्गूलशब्देन | लाङ्गूल–शब्द (३.१) |
| स्वनन्तीव | स्वनन्ति (√स्वन् लट् प्र.पु. बहु.)–इव (अव्ययः) |
| दिशो | दिश् (१.३) |
| दश | दशन् (१.१) |
| एष | एतद् (१.१) |
| वानरराजेन | वानर–राज (३.१) |
| सुग्रीवेणाभिषेचितः | सुग्रीव (३.१)–अभिषेचित (√अभि-सेचय् + क्त, १.१) |
| यौवराज्ये | यौवराज्य (७.१) |
| ऽङ्गदो | अङ्गद (१.१) |
| नाम | नाम (अव्ययः) |
| त्वाम् | त्वद् (२.१) |
| आह्वयति | आह्वयति (√आ-ह्वा लट् प्र.पु. एक.) |
| संयुगे | संयुग (७.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | स्य | ला | ङ्गू | ल | श | ब्दे | न | स्व | न | न्ती | व |
| दि | शो | द | श | ए | ष | वा | न | र | रा | जे | न |
| सु | र्ग्री | वे | णा | भि | षे | चि | तः | यौ | व | रा | ज्ये |
| ऽङ्ग | दो | ना | म | त्वा | मा | ह्व | य | ति | सं | यु | गे |