पदच्छेदः
| यश्चापरो | यद् (१.१)–च (अव्ययः)–अपर (१.१) |
| भवेत् | भवेत् (√भू विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| ताभ्यां | तद् (५.२) |
| लवेन | लव (३.१) |
| सुसमाहितः | सु (अव्ययः)–समाहित (१.१) |
| निर्मार्जनीयो | निर्मार्जनीय (√निः-मृज् + अनीयर्, १.१) |
| वृद्धाभिर् | वृद्ध (३.३) |
| लवश्चेति | लव (१.१)–च (अव्ययः)–इति (अव्ययः) |
| स | तद् (१.१) |
| नामतः | नामन् (५.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | श्चा | प | रो | भ | वे | त्ता | भ्यां |
| ल | वे | न | सु | स | मा | हि | तः |
| नि | र्मा | र्ज | नी | यो | वृ | द्धा | भि |
| र्ल | व | श्चे | ति | स | ना | म | तः |