तच्छ्रुत्वा भरतेनोक्तं दृष्ट्वा चापि ह्यधोमुखान् ।
पौरान्दुःखेन संतप्तान्वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥
तच्छ्रुत्वा भरतेनोक्तं दृष्ट्वा चापि ह्यधोमुखान् ।
पौरान्दुःखेन संतप्तान्वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥
M N Dutt
Hearing those words of Bharata and beholding the subjects stricken with sorrow having their heads downwards, Vasistha said.पदच्छेदः
| तच्छ्रुत्वा | तद् (२.१)–श्रुत्वा (√श्रु + क्त्वा) |
| भरतेनोक्तं | भरत (३.१)–उक्त (√वच् + क्त, २.१) |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा) |
| चापि | च (अव्ययः)–अपि (अव्ययः) |
| ह्यधोमुखान् | हि (अव्ययः)–अधोमुख (२.३) |
| पौरान् | पौर (२.३) |
| दुःखेन | दुःख (३.१) |
| संतप्तान् | संतप्त (√सम्-तप् + क्त, २.३) |
| वसिष्ठो | वसिष्ठ (१.१) |
| वाक्यम् | वाक्य (२.१) |
| अब्रवीत् | अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | च्छ्रु | त्वा | भ | र | ते | नो | क्तं |
| दृ | ष्ट्वा | चा | पि | ह्य | धो | मु | खान् |
| पौ | रा | न्दुः | खे | न | सं | त | प्ता |
| न्व | सि | ष्ठो | वा | क्य | म | ब्र | वीत् |